हम हर चीज के लिए अपने स्मार्टफोन और कंप्यूटर पर निर्भर हो गए हैं। मैं बच्चों की पढ़ाई हो, या ऑफिस काम, रेलवे और एयरपोर्ट का टिकट बुक करना हो या यूपीआई से पेमेंट करना हो। ऑफिस के काम के लिए हम पूरी तरीके से डिजिटल गैजेट पर निर्भर हो गए हैं। बाकी जो समय बचता है वह वही यूट्यूब की रील देखने में चला जाता है। ऐसा लगता है कि आजकल की युवा पीढ़ी डिजिटल गैजेट के बिना सरवाइव ही नहीं कर सकती है।
लेकिन क्या आपने कभी यह विचार किया है कि हमारे तनाव का कारण यह डिजिटल दुनिया है। आजकल की युवा पीढ़ी के के लिए मोबाइल जरूरी हो गया है। वह सुबह से शाम तक अपना मोबाइल और नोटिफिकेशन चेक करते रहते हैं और थकावट महसूस करते रहते हैं तो आप सही आर्टिकल पर आए हैं। इस आर्टिकल में हम जानेंगे कि डिजिटल स्ट्रेस क्या है और इससे कैसे बचें। हम अपनी रोजमर्रा की दिनचर्या में डिजिटल स्ट्रेस के कारण और प्रभाव जानेंगे।डिजिटल स्ट्रेस से निपटना भी जानेंगे।
डिजिटल स्ट्रेस क्या है
डिजिटल स्ट्रेस को सरल शब्दों में कहें तो डिजिटल स्ट्रेस वह मानसिक दबाव अथवा तनाव है जो डिजिटल गैजेट (मोबाइल और कंप्यूटर) का बहुत अधिक उपयोग करने से होता है। जैसे मोबाइल फोन पर लगातार मैसेज और नोटिफिकेशन आना। यूट्यूब, फेसबुक, और इंस्टाग्राम और सोशल मीडिया की लगातार स्क्रॉलिंग करना। जब हम सुबह उठते हैं तो सबसे पहले अपने नोटिफिकेशन और ईमेल चेक करते हैं जिसका अर्थ है हम सबसे पहले उठकर अपनी शुरुआत टेंशन से ही करते है। डिजिटल स्ट्रेस का प्रमुख कारण सोशल मीडिया ही है।
यदि आप FoMO की कांसेप्ट को अच्छी तरह से समझ लेते हैं तो आप आसानी से समझ जाएंगे की डिजिटल स्ट्रेस क्या है? FoMO मतलब Fear of missing Out , इसका सीधा सा मतलब है कि यदि हम ऑनलाइन नहीं रहे तो हमसे कुछ ऐसा महत्वपूर्ण तथ्य छूट न जाए लेकिन कब धीरे-धीरे यह अनावश्यक समय बर्बाद करने में बदल जाता है हमें पता ही नहीं लगता है। आजकल अधिकतर लोग वर्क फ्रॉम होम करते हैं वह सबसे ज्यादा डिजिटल स्ट्रेस से परेशान हैं।
डिजिटल स्ट्रेस कई तरीके की होती है लेकिन दो तरीके मुख्य रूप से पाए जाते हैं जैसे
1.कम्युनिकेशन ओवरलोड
2. सोशल मीडिया कंपैरिजन।
1. कम्युनिकेशन ओवरलोड:
जब किसी व्यक्ति या सिस्टम पर इतनी ज़्यादा जानकारी, मैसेज, कॉल, नोटिफिकेशन और काम एक साथ आ जाए कि वह उन्हें ठीक से समझ, प्रोसेस या जवाब ही न दे पाए।
सरल शब्दों में:
बहुत ज़्यादा बातें + बहुत कम समय = दिमाग थक जाना
कम्युनिकेशन ओवरलोड के कारण
1. मोबाइल और सोशल मीडिया
WhatsApp, Telegram, Instagram, Email, Calls – सब एक साथ
2. वर्कप्लेस प्रेशर
एक ही समय में कई टास्क और मीटिंग
3. लगातार नोटिफिकेशन
हर मिनट मोबाइल चेक करना
4. बहुत लोगों से संपर्क
परिवार, दोस्त, ऑफिस, बिज़नेस – सबकी मांग
5.जानकारी की बाढ़
न्यूज़, यूट्यूब, रील्स, पोस्ट, मैसेज
कम्युनिकेशन ओवरलोड के लक्षण (Symptoms)
- दिमाग भारी लगना
- चिड़चिड़ापन
- थकान
- ध्यान केंद्रित न कर पाना
- भूलने की आदत
- तनाव (Stress)
- निर्णय लेने में परेशानी
2. सोशल कम्पैरिजन
सोशल कम्पैरिजन (Social Comparison) का मतलब है —
जब कोई व्यक्ति खुद की ज़िंदगी, सफलता, पैसा, रूप-रंग, पढ़ाई या रिश्तों की तुलना दूसरों से करने लगता है।
सरल शब्दों में
“उसके पास मुझसे ज़्यादा है… मैं पीछे रह गया हूँ।”
यही है सोशल कम्पैरिजन।
डिजिटल स्ट्रेस के कारण: रोजमर्रा की आदतें जो तनाव बढ़ाती हैं
डिजिटल स्ट्रेस का मुख्य कारण इंटरनेट पर बहुत सारी सूचनाओं की बाढ़ है। जब हम हजारों पोस्ट और वीडियो देखते हैं तो हमारा दिमाग होगा ओवर
डिजिटल स्ट्रेस के कारण क्या हैं? सबसे बड़ा डिजिटल स्ट्रेस के कारण है सूचनाओं की बाढ़। हर दिन हजारों पोस्ट और न्यूज देखते हैं, जो दिमाग को ओवरलोड कर देता है। डिजिटल स्ट्रेस के कारण और प्रभाव को समझें तो पता चलता है कि सोशल मीडिया एक बड़ा फैक्टर है। लोग इंस्टाग्राम पर दूसरों की जिंदगी देखकर तुलना करते हैं, जो डिजिटल स्ट्रेस के कारण बनता है।
डिजिटल स्ट्रेस का एक और मुख्य कारण है इंटरनेट से हमेशा जुड़े रहना। यदि हम देर रात तक काम के ही में अथवा मैसेज भी चेक करते हैं तो यह हमारी रोजमर्रा की दिनचर्या को बिगाड़ देती है। जिससे हमारी वर्क लाइफ भी बिगड़ जाती हैं। कोरोना के बाद लोगों का ज्यादा वर्क फ्रॉम होम करना भी डिजिटल स्ट्रेस का कारण बन गया। आजकल महिलाएं घर और बाहर दोनों का काम करती हैं जिससे मैं आराम नहीं कर पाती है उनके पास जो बाकी समय बचता है उसे वह सोशल मीडिया पर बर्बाद करती है।
आज के डिजिटल युग में इंटरनेट और सोशल मीडिया जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन इसके साथ ही डिजिटल स्ट्रेस (Digital Stress) की समस्या भी तेजी से बढ़ रही है। डिजिटल स्ट्रेस के प्रमुख कारणों में ऑनलाइन नेगेटिव इंटरैक्शन (Online Negative Interaction) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब कोई व्यक्ति सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर नकारात्मक टिप्पणियों, ट्रोलिंग, साइबर बुलिंग या अपमानजनक संदेशों का सामना करता है, तो इसका सीधा प्रभाव उसके मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है।
सोशल मीडिया पर लोग अक्सर अपनी उपलब्धियाँ और खुशियाँ साझा करते हैं, लेकिन इसके बदले मिलने वाली नकारात्मक प्रतिक्रियाएँ व्यक्ति के आत्मसम्मान को कमजोर कर देती हैं। बार-बार मिलने वाले हेट कमेंट्स और आलोचनात्मक संदेश तनाव, चिंता और निराशा को जन्म देते हैं। यह स्थिति धीरे-धीरे सोशल मीडिया तनाव और भावनात्मक असंतुलन का कारण बनती है।
ऑनलाइन नेगेटिव इंटरैक्शन के सामान्य रूपों में साइबर बुलिंग, ट्रोलिंग, अपमानजनक मैसेज, ऑनलाइन बहस, अफवाहें और नकारात्मक समाचार शामिल हैं। ये सभी व्यक्ति की सोच और भावनाओं पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। कई बार लोग डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हुई किसी छोटी घटना को लंबे समय तक मन में दोहराते रहते हैं, जिससे उनकी नींद, एकाग्रता और कार्यक्षमता प्रभावित होती है।
इसके अलावा, लगातार नकारात्मक कंटेंट देखने से व्यक्ति को यह महसूस होने लगता है कि समाज उसके खिलाफ है या वह दूसरों से कमतर है। इससे आत्मविश्वास में कमी आती है और अवसाद (Depression) तथा चिंता (Anxiety) जैसी मानसिक समस्याएँ बढ़ सकती हैं। इसलिए यह कहा जा सकता है कि ऑनलाइन नेगेटिव इंटरैक्शन डिजिटल स्ट्रेस का एक गंभीर और उपेक्षित कारण है।
आज बड़ी संख्या में लोग अपने मोबाइल फोन पर लाइक्स, कमेंट्स और व्यूज़ की चिंता में उलझे रहते हैं। उन्हें यह जानने की बेचैनी रहती है कि उनकी पोस्ट पर कितनी प्रतिक्रिया आई और लोग उनके बारे में क्या सोच रहे हैं। यह लगातार बनी रहने वाली मानसिक बेचैनी तनाव और असुरक्षा की भावना को जन्म देती है।
सोशल मीडिया एडिक्शन व्यक्ति को वास्तविक जीवन से दूर कर देता है और उसे एक आभासी दुनिया में बांध देता है। जब किसी पोस्ट पर अपेक्षित लाइक्स या सकारात्मक कमेंट नहीं मिलते, तो व्यक्ति निराश और हतोत्साहित महसूस करने लगता है। धीरे-धीरे यह आदत आत्मसम्मान को प्रभावित करती है और व्यक्ति खुद की तुलना दूसरों से करने लगता है, जिससे मानसिक दबाव और चिंता बढ़ती है।
डिजिटल स्ट्रेस का एक और बड़ा कारण है नींद से पहले मोबाइल फोन का अधिक उपयोग। रात में सोने से पहले सोशल मीडिया स्क्रॉल करना, वीडियो देखना या मैसेज चेक करना दिमाग को सक्रिय रखता है और नींद की गुणवत्ता को खराब करता है। मोबाइल स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी (Blue Light) मस्तिष्क को यह संकेत देती है कि अभी जागने का समय है, जिससे व्यक्ति को देर से नींद आती है। परिणामस्वरूप शरीर और मन दोनों को पर्याप्त आराम नहीं मिल पाता और अगला दिन थकावट तथा चिड़चिड़ेपन के साथ शुरू होता है।
यदि हम डिजिटल स्ट्रेस के इन कारणों को समय रहते पहचान लें, तो इससे बचाव करना अपेक्षाकृत आसान हो जाता है। सोशल मीडिया पर बिताए जाने वाले समय को सीमित करना, लाइक्स और कमेंट्स को अपनी खुशी का आधार न बनाना तथा सोने से पहले मोबाइल फोन से दूरी बनाए रखना महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं। इसके साथ ही, डिजिटल डिटॉक्स अपनाना और वास्तविक जीवन की गतिविधियों जैसे योग, ध्यान और पारिवारिक संवाद को प्राथमिकता देना मानसिक संतुलन बनाए रखने में सहायक सिद्ध होता है।
डिजिटल स्ट्रेस के प्रभाव: दिमाग और शरीर पर क्या असर
डिजिटल स्ट्रेस के प्रभाव क्या हैं? सबसे पहले मानसिक प्रभाव – चिंता और उदासी बढ़ना। ज्यादा स्क्रीन टाइम से दिमाग हमेशा व्यस्त रहता है। डिजिटल स्ट्रेस के प्रभाव में नींद की कमी आती है, जो थकान पैदा करती है। लखनऊ में कई लोग डिजिटल स्ट्रेस के प्रभाव से चिड़चिड़े हो जाते हैं।
शारीरिक डिजिटल स्ट्रेस के प्रभाव में सिरदर्द और आंखों का दर्द शामिल है। गर्दन और पीठ दर्द भी आम है। डिजिटल स्ट्रेस के प्रभाव से इम्यून सिस्टम कमजोर होता है, बीमारियां जल्दी लगती हैं। छात्रों पर डिजिटल स्ट्रेस के प्रभाव ज्यादा – फोकस कम होता है, पढ़ाई प्रभावित।
डिजिटल स्ट्रेस के प्रभाव में रिलेशनशिप्स खराब होती हैं। रियल बात कम हो जाती है। कोर्टिसोल हॉर्मोन बढ़ने से डिजिटल स्ट्रेस के प्रभाव गंभीर हो जाते हैं। महिलाओं में डिजिटल स्ट्रेस के प्रभाव ज्यादा देखे जाते हैं। डिप्रेशन और बर्नआउट डिजिटल स्ट्रेस के प्रभाव का हिस्सा हैं।
डिजिटल स्ट्रेस के प्रभाव में उत्पादकता गिरती है। काम पर ध्यान भटकता है। युवाओं में मेंटल हेल्थ खराब होना डिजिटल स्ट्रेस के प्रभाव है। लखनऊ में डॉक्टरों के पास जाने वाले कई केस डिजिटल स्ट्रेस के प्रभाव से जुड़े हैं।
डिजिटल स्ट्रेस के प्रभाव को अनदेखा न करें। यह क्रॉनिक बीमारियां पैदा कर सकता है। डिजिटल स्ट्रेस के प्रभाव समझकर बचाव के कदम उठाएं।
डिजिटल स्ट्रेस से कैसे बचें: व्यावहारिक टिप्स और तरीके
डिजिटल स्ट्रेस से कैसे बचें? यह सवाल कई लोग पूछते हैं। पहला तरीका है डिजिटल डिटॉक्स लेना। रोजाना 1-2 घंटे फोन से दूर रहें। डिजिटल स्ट्रेस से कैसे बचें में बॉउंडरीज सेट करना महत्वपूर्ण है – काम के बाद ईमेल न चेक करें।
नोटिफिकेशन मैनेज करना डिजिटल स्ट्रेस से कैसे बचें का आसान तरीका है। सिर्फ जरूरी अलर्ट रखें। मेडिटेशन डिजिटल स्ट्रेस से कैसे बचें में मदद करता है – रोज 10 मिनट सांस लें। सोशल मीडिया क्लीनअप करें – नेगेटिव कंटेंट अनफॉलो।
डिजिटल स्ट्रेस से कैसे बचें में जवाब देने में देरी करना शामिल है। तुरंत रिप्लाई न करें। व्यायाम डिजिटल स्ट्रेस से कैसे बचें का अच्छा उपाय है – रोज वॉक करें। सोच बदलना – पॉजिटिव देखें – यह डिजिटल स्ट्रेस से कैसे बचें में काम आता है।
नींद सुधारना डिजिटल स्ट्रेस से कैसे बचें का बेसिक स्टेप है। सोने से पहले फोन न देखें। मेंटल हेल्थ ऐप्स यूज करें। हॉबीज डेवलप करना डिजिटल स्ट्रेस से कैसे बचें में फायदेमंद है – पेंटिंग या गार्डनिंग।
फैमिली टाइम बढ़ाएं। स्क्रीन टाइम ट्रैक करें। नेचर में समय बिताएं। किताब पढ़ें। प्रोफेशनल हेल्प लें अगर जरूरत हो।
डिजिटल स्ट्रेस से कैसे बचें में समय प्रबंधन जरूरी है। योगा क्लासेस जॉइन करें। ये तरीके अपनाकर डिजिटल स्ट्रेस से कैसे बचें संभव है।
डिजिटल स्ट्रेस से कैसे बचें के और टिप्स – डेली रूटीन बनाएं। ऐप ब्लॉकर यूज करें। पॉजिटिव कंटेंट फॉलो करें। दोस्तों से बात करें। संगीत सुनें।
डिजिटल स्ट्रेस का समाज पर असर: एक बड़ा नजरिया
डिजिटल स्ट्रेस का समाज पर असर क्या है? परिवारों में बात कम हो रही है। सब फोन में व्यस्त। पारंपरिक परिवारों में डिजिटल स्ट्रेस का समाज पर असर टूटन पैदा कर रहा है। डिजिटल स्ट्रेस का समाज पर असर अलगाव बढ़ाना है।
स्कूलों में बच्चे प्रभावित हैं। डिजिटल स्ट्रेस का समाज पर असर युवाओं की मेंटल हेल्थ पर है। कंपनियां अब डिजिटल डिटॉक्स प्रोग्राम चला रही हैं। डिजिटल स्ट्रेस का समाज पर असर समझकर जागरूकता फैलाएं।
डिजिटल स्ट्रेस का समाज पर असर कार्यक्षमता कम करना है। लखनऊ में ऑफिस वर्कर्स इससे जूझ रहे हैं। समाज को डिजिटल स्ट्रेस का समाज पर असर कम करने के लिए कदम उठाने चाहिए।

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